बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

कितनी ही गज़लें उलझी हैं......

Dedicated to All the Beautiful Womens of the World.....

कितनी ही गज़लें उलझी हैं तेरे मुलायम बालों पर,
 अटके हैं कितने ही सानी, मिसरे तेरे गालों पर।
 सुरमई रातों, में टपके थे, लफ्ज़ कभी तेरे लब से,
 जुगनूं के मानिंद फिरें हैं, हरसू मेरे खयालों पर।
  याद भी करना भूल गए तुम, याद भी आना भूल गए,
जंग कहीं, लग जाए न इक दिन, इन यादों के तालों पर।
सूरज की पहली किरणों पर, मोती जैसी चमके हैं,
 तेरे कंगन के मोती या, औंस की बूंदें जालों पर।
 दर्द से वो, घबरा जाता है, पूछ न लें कहीं हाले दिल,
 फफ़क के हमदम रो जाएगा, इतने सख़्त सवालों पर।
कितनी ही गज़ले उलझी हैं, तेरे मुलायम बालों पर।
 अटके हैं कितने ही सानी, मिसरे तेरे गालों पर।  -डिम्पल सिरोही