रविवार, 21 दिसंबर 2014

खिड़की से मेरी चांद.......

यूं ही नहीं आता फलक पर 
सुनहरा चांद,
 कोई है जो रोपता है
रोशनी का बीज क्षितिज के उस पार,
कोई है जो सींचता है,
हर रोज नियम के साथ,
बुनता है रेशा-रेशा
किरणों का कोई बांध,
तब
उभरता है अर्श पर
बनके आधा सा टुकड़ा चांद,
कोई है जो सिखाता है
अंगुली पकड़कर चलना इसे,
कोई है जो गोद में लेकर दिखाता है
दुनिया की राह,
कोई है जो दुलार देकर उसे
कायनात को सौंप देता है।

तभी तो हर दिशा में दौड़ता, मुस्कुराता,
अठखेलियां करता हुआ,
झांका करता है हर रोज,
खिड़की से मेरी चांद। 

                       -डिम्पल सिरोही

एक सुरीला कलाम सुनाती है खामोशी,





एक सुरीला कलाम सुनाती है खामोशी,
सन्नाटों में जब गुनगुनाती है खामोशी।

लफ्ज नाकाम रहे कहने में जिसे मुद्दतों,
वो बात कह के चली जाती है मुझसे खामोशी।


सांझा करने लगी हूं राज-ए-दिल इसी से अब,।
गुफ्तगू करने लगी है मुझसे खामोशी।


हो गई हूं और भी करीब अपने ,
मुझको मेरी पहचान सिखाने लगी है खामोशी।


ये शोर दे सका न मुझे कुछ अश्क के सिवा
बस एक मासूमियत से पेश आती है खामोशी। 

                                          -डिम्पल सिरोही

पुरूष दिवस पर बधांईयां न मिलने की टीस

 पुरूष दिवस पर बधांईयां न मिलने की टीस

जैसे ही सर्दियां शुरू होती हैं तो पड़ोसी मिश्रा जी अक्सर सुबह के वक्त लॉन में आकर धूप में पड़ी कुर्सियों पर बैठकर ही अखबार पढ़ते हैं। इस दौरान कई बार वह चाय की फरमाईश भी कर देते हैं। दरअसल, वह अपनी पत्नी के साथ रहते हैं,  उनके एक बेटे की एक्सीडेंट में मौत हो गई और दूसरा विदेश गया जो कभी लौटकर नहीं आया। हालांकि वह एक खुशमिजाज़ व्यक्ति हैं, लेकि
न आज तड़के ही मिश्रा साहब अपने अर्धांगिनी के साथ लॉन में आराम कुर्सी पर बैठे अखबार को बड़ी खा जाने वाली नजरों से देख रहे थे। हमने पूछा क्या हुआ मिश्रा सहाब, खबरों पर काहे खीज रहें हैं या फिर आज सुबह की चाय नसीब नहीं हुई। हमारा इतना कहना था मिश्रा जी ने बुदबुदाना शुरू कर दिया। अरे मिश्रा जी, गुस्सा करना आपकी सेहत के लिए अच्छा नहीं है वैसे भी आप दिल के मरीज हैं, सो निकाल ही दीजिए दिल का गुब्बार। इतना कहते हुए चाय का कप दौनोंके हाथों में थमाते हुए हम भी खाली पड़ी कुर्सी पर बैठ गए। मिश्रा जी ने बोलना शुरू किया, 19 नवंबर को विश्व पुरुष दिवस मनाया गया। विडंबना तो देखो कि विश्व शौच दिवस भी इसी दिन आता है। अरे शोचनीय दशा तो बेचारे पुरुषों की है। दुनिया भले ही पुरुष प्रधान समाज जैसे शब्दों की आड़ में कितना ही पुरुषों को कोस ले, लेकिन असल में मुसीबत तो मर्दों की महिलओं से कहीं ज्यादा ही हैं। अब घर से ही शुरू कर लो, महिलाएं जिस वक्त टीवी सीरियल्स में बहू की तीसरी शादी को देखने के लिए एक्साईटेड हो रही होती हैं, उस समय पुरुष अमेरिका के जंगी जहाजों पर नजर गड़ाए रहेंगे। न्यूयॉर्क एक्सचेंज के दाम बढ़ें या गिरें पुरुषों की सूरत देखकर इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। गजब तो तब हो जाए जब चुनाव हों, यह समझिए कि पुरुषों की तो आफत ही आ गई, दूर के रिश्तेदार भी इनसे फोन और फेसबुक पर पूछ लें और पता नहीं कब कौन सी पार्टी से संबधित सवाल इन्हें हल करना पड़ जाए। भला कभी किसी महिला से कोई यह सवाल होता है कि आप वोट किसे करेंगी या अमुक पार्टी की हार का सबसे प्रमुख कारण क्या था। इसके अलावा यदि दूसरे टाइमजोन में क्रिकेट या फीफा वर्ल्डकप हो, तो रातभर की नींद किसकी उड़ती हैं पुरुषों की ही न। इतना ही नहीं पुरुषों को कदम-कदम पर समझौता करना पड़ता है, मन मारना पड़ता है, त्याग करना पड़ता है। पुरुष साल भर में बामुश्किल अपने लिए शॉपिंग का मन बनाते हैं। थोड़ा वक्त मिल भी गया तो मार्केट जाने पर इन्हें कभी सही फिटिंग के वस्त्र नसीब नहीं होते। अािखरकार लॉन्ग कुर्ता, ओवरसाइज्ड चैक शर्ट और ब्लैक शूज इनकी फेवरेट फेहरिस्त में शामिल हो जाते हैं। इतिहास लिखे गए, लेकिन पुरुषों पर जुल्म की बात तो कभी किसी ने की ही नहीं, अब जरा देखिए यदि कोई पुरुष बीमार अवस्था में बस या ट्रेन में खड़ा होकर सफर कर रहा हो, उसके लिए कभी कोई सीट छोड़ता है क्या? और यदि वही पुरुष किसी अन्य दिन किसी महिला के लिए सीट न छोड़े, तो बस में सवार लोग उसे खा जाने वाली नजरों से घूरेंगे। आपने कभी किसी स्वस्थ महिला को बीमार पुरुष के लिए सीट छोड़ते हुए देखा है। महिला तो दूर कोई पुरूष भी उसके लिए सीट न छोड़े। प्रकृति ने भी पुरुषों के साथ कम अन्याय नहीं किया। पहला तो उन्हें बनाया ही कलर ब्लाइंड है, महिलाएं जहां रंगों के नाम पर बेबी पिंक, मजेंटा, सेलमन और यैलो सॉफ्ट में डूबी रहती हैं पुरुषों को काला, ब्लू और रेड हॉट के अलावा कोई रंग ही नजर नहीं आता। दूसरा गणित में ऊपर वाले ने ही कच्चा छोड़ दिया। किसी महिला से पूछो कि एक इंसान के लिए चावल कैसे बनाएं, तो वह गणित में जवाब देंगी- दो मुठ्ठी चावल डालो चावल से डेढ अंगुल ऊपर तक पानी और एक सीटी बजाकर बंद कर दो। अब इस हिसाब को सही मानकर कोई पुरुष चावल बनाए, तो न चावल सही पड़े न पानी और सीटी तो तब तक बजती रहेगी जब तक चावल राख न हो जाएं। पुरुष तो बेचारे किसी से दुश्मनी भी नहीं पालते। महिलाएं तो उस औरत की परछाईं से भी बचती हैं, जिसने उनके जैसे ही ईयररिंग्स पहन रखें हों, लेकिन यदि किसी पुरुष को अपने जैसी शर्ट पहने कोई व्यक्ति मिल भी जाए, तो उससे ऐसे मिलता हैं जैसे कुंभ में बिछड़े हुए भाई से मिल रहा हो। अक्सर कहा जाता है कि  महिला ही दूसरी महिला की शत्रु होती है, लेकिन यह कहना भी गलत नहीं है कि पुरुष भी खुद ही पुरुष का दुश्मन होता है। और इस दुश्मनी में वह सभी पुरुष शामिल हैं जो वूमेन्स डे पर तो चार फुट की बधाइंया देते हैं और फेसबुक पर पोस्ट अपलोड करते हैं लेकिन पुरुष दिवस पर चार लाईन का मैसेज तक नहीं करते। मिश्रा साहब के मुहं से पुरुषों का अथाह दुख सुनकर तो मेरी भी आंखे भर आर्इं, मिश्रा जी आपकी नाराजगी जायज है लेकिन जरा सोचिए, इतने दुख भरे जीवन में और जहां गणित कमजोर हो, ऐसे में यही हुआ होगा कि  जिस तरह पुरुषों को अपना जन्मदिवस और अपनी शादी की सालगिरह तक याद नहीं रहती इसी तरह पुरुष दिवस भी याद नहीं रहा होगा।

डिम्पल सिरोही 22/11/2014

शनिवार, 20 सितंबर 2014

कल रात
गोलमटोल चांद को देखकर
याद आया चांद की ही तरह,
एक शून्य ही तो हैं हम सभी
कुछ छोटे और कुछ बड़े-बडे,
अनगिनत और अलग रंगों के
कुछ भूरे कुछ मटमैले से।
विचरण करते हैं इस गोल दुनिया में
जहां से शुरू होते हैं वहीं हो जाते हैं खत्म
जिस तरह चांद अनंत अंतरिक्ष में
जहां से चलता है वहीं वापस आकर,
थकान से मूंद लेता है आंखें
इसी तरह हम भी
शून्य से चलकर मिट जाते हैं शून्य पर
और चलता रहता है
सिलसिला शून्य का निरंतर।
- डिम्पल सिरोही

शनिवार, 26 जुलाई 2014

बदले हजार दौर, मगर रोशनी रही.......


वो कामयाब क्या हुए, इतरा रहे हैं यूं
जैसे कि उनके पांव के नीचे जमीं नहीं।

परवाने जल के मर गए, शमा न बुझ सकी
बदले हजार दौर, मगर रोशनी रही।

हमने दिए जलाए थे इक इश्तियाक से
जल जाएगा शहर ही ये सोचा न था कभी।

फुरसत के लम्हे मांग के मसरूफियत से तुम,
आओ कि बेकरारी की आदत नहीं रही।

इजहार-ए-इश्क तुमको खफा कर न दे कहीं
ख्वाहिश ये आज भी मेरी दिल में ही रह गयी।

सोमवार, 14 जुलाई 2014

कुछ तो कहो.............

रह गई किस चीज की मुझमें कमी कुछ तो कहो
किस तरह होगी मुकम्मल जिंदगी कुछ तो कहो
आज तो जलता हुआ था धूप में मौसम मगर,
फिर हवा में आ गई कैसी नमी, कुछ तो कहो
आसमां सुनसान है क्यों, गुम खड़े हैं क्यों दरख्त,
शहर क्यों उजड़ा हुआ है, तीरगी कुछ तो कहो
घंटियों की क्यों सदा आती नहीं मंदिर से अब,
दूर क्यों बजती नहीं है बांसुरी, कुछ तो कहो
इस अंधेरे के सिवा दिखता नहीं क्यों और कुछ
हो गई सूरज को क्या नाराज़गी कुछ तो कहो
दूर है मुझसे तबस्सुम, गम ही गम नज़दीक है
किस तरह मरकर कटेगी जिंदगी कुछ तो कहो
गर्दिशों की रहगुजर में शाम क्यों आती नहीं
है अभी कितना सफर वीरानगी कुछ तो कहो
तक रहा था देर तक क्यों आईना डिम्पल मुझे
लग रही हूं आज क्या मैं अजनबी कुछ तो कहो

रविवार, 6 जुलाई 2014

याद शहर....

  मेरे मन में कल ख्याल आया कि मैं जब पहली बार मेरठ आई थी, तो सोचा था यहां बहुत सी ख्वाहिशों, सपनों और कल्पनाओं को पंख लगाने हैं। लेकिन मुझे ये शहर कभी रास नहीं आया। हो सकता है इसे मैं पसंद नहीं या मुझे यहां रहने का ढंग नहीं आता। हर बार इस शहर से दूर हो जाने की योजना बनती है, मगर मुकाम तक नहीं पहुंचती। पता नहीं क्यों, ये शहर मुझे कहीं और क्यों नहीं जाने देता, हर बार मुझे यहां किसी न किसी बहाने कैद किए रहता है। मैं ऊब गई हूं इस शहर से अलविदा कहना चाहती हूं इसे। इसी ऊब को मैनें कुछ यूं निकाला है                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              धूप धुंधलाई हुई और जिंदगी कुम्हलाई हुई सी,
तपती धूप में जल जाते थे पांव,
 सड़कों पर दौड़ता था सन्नाटा कुछ बुदबुदाता सा,
 कुछ जिस्म रेंगते थे, कुछ रूहें ठिठुरती थीं धूप की चुभन से,
मेरी परछांई मुझी में समा जाती थी हर कदम
 आंखों में ख्वाब समेटे चली जा रही थी मैं
 हाथों में जिंदगी थामे,
 हा,ं जिंदगी ही तो थी
 कुछ ओढ़न, पैरहन और खाने का सामान,
 इस शहर में कोई भी तो नहीं था मेरा
 अकेले घूमना था मुझे सरे शहर तेरा।
 बरसती थी धूप उन गलियों में फिर भी था अंधेरा
 खुले थे द्वार,
 मगर खाली था बसेरा।
मैंने झांका तो वक्त के कुछ बासी लम्हों को पाया,
आवाज दी मगर कोई आहट, साया कोई भी तो नहीं आया।
कितना अकेला था यह शहर,
 हर मोड़ पर रूक के पुकारा कि कोई सुनेगा आहट,
 कोई रोकेगा कहेगा कि कुछ देर यहां ठहर।
 फिर लगा कहीं ऐसा तो नहीं,
 हो ये लुटेरों का शहर।
सोचा ही था कि  आके एक बच्चे ने पकड़ लिया दामन
बोला अजनबी हो.. आओ तुम्हें इस शहर से मिलवाता हूं
उस आवाज में कसक थी मासूमियत और सच्चाई थी
हाथ पकड़े हुए बढ़ चला था खामोशियों की ओर
 मेरे सवालों को मिला भी न था जवाब कि उसने इशारा किया
 यहां रहती है मुफ़लिसी,लाचारी, बीमारी, हयात, यहीं मैं रहता हूं।
ये कर्जदारों, ब्याजखोरों, मनचलों और लुटेरों को मोहल्ला है।
 इस कोने पर रहती है थोड़ी ईमानदारी सज्जनता और होशियारी
पर्दे में ही रहा करती है अक्सर
उस तरफ कभी न जाना वहां मुर्दे सोएं हैं।
साया था या फरिश्ता, इतना कहकर गुम हो गया था कहीं।
 उसके जाते ही मेरे कानों में गूंजा भयंकर स्वर
घने शोर की आवाज सुनी थी अचानक मैनें
या किसी ख्वाब से जागी थी यकायक मैं।
 नहीं, अचानक नींद से जागा था ये शहर
 मैनें देखा, मुझे हिरासत में ले चुकीं थी सैकड़ों आवाजें।
 इस जुर्म की गिरफ्त में थी मैं कि मैंनें देखा था
 एक ख्वाब।
शोर के शहर में आज तक बंदी हूं वहां मैं जहां
 न अंधेरा है, न उजाला है, न दिन न रात,
 थकते-टूटते जिस्मों में जब दर्द को नींद आने लगती है
 ज़र्द चेहरा लिए एक चांद फ़लक पर आता है हर रोज,
 कहता है मुश्किल है, मगर
कैद-ए-जां से अच्छा है आसमानों को शहर
 मुझे यकीं है मिलेगी एक दिन मुझको रिहाई जरूर
होंगे आजाद सारे ख्वाब फ़लक के चांद की तरह
 जिंदगी की नव्ज़ पर पड़े बेड़ियों के निशान
 वक्त तो मिटा न सकेगा मगर,
 इसी बहाने ही सही रहेगा तेरा याद शहर।

शनिवार, 5 जुलाई 2014

 घर की अलमारी में, दराजों में, पुराने बक्से में
 बहुत ढूंढा  मगर, बीता वक्त कहीं मिला नहीं।

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

फिर बढ़ेंगे रोटी के दाम......


शहर में भीड़ है, शहर में बहुत शोर है।
 शहर की सड़कों को खूबसूरत बनाने की बात कही जा रही है,
 किसी चौराहे से सुनाई पड़ती है किसी पार्टी के उम्मीदवार की आवाज।
 बदहवास लोग शाम के अंधेरे में उसकी एक झलक पाने को बढ़े चले जा रहे हैं।
 दूर गांवों से आते हुए घंटो उसी जाम चौराहे पर रूके आॅटो में कराहती है बीमार महिला,
तमाम जुर्म, कत्ल, खुदकुशी, बीमारियों को खत्म करने के ठहाके रूकने का नाम नहीं ले रहे।
एक बेजान सी आवाज में गाली जबान पर है, ये चुनाव का मौसम है हर इक नेता इम्ताहन पर हैं।
 मुझे भी देर हो रही फिर भी सुनना पड़ता है लाउड स्पीकर का ककर्श स्वर,
 आभास हो रहा है मुझे हवा में कल घुलने वाली कड़ुवाहट का
 वोट तो मुझे भी करना है, मगर किसे...?
 अब डर लगता है नेताओं की मुस्कानों से, दोस्ती की चालों और शतरंज की बिसातों से।
 महंगाई, आतंक और दंगों से, पुलिस से, नेताओं और चुनावी फसादों से।
 अरे छोड़िए भी, फिर से वोट देंगे आप अपने ही विवेक से किसी एक को ।
 फिर आएगा पहले जैसा ही कोई शासन, फिर बढ़ेंगे रोटी के दाम,
 फिर रह जाएंगे कितने ही युवा बेरोजगार, फिर अनदेखे कर दिए जाएंगे बालमजदूरों के हाथों के छाले,
 फिर चिथड़ों में बिखर जाएगा कोई मासूम जिस्म,
 फिर आएगा चुनाव का मौसम और फिर से आप कहेंगे इस बार नहीं।

बर्ड या 'बॉडी आर्ट'...........




 आपने यह तस्वीर ध्यान से देखी होगी और सोचा होगा कि वास्तव में यह एक खूबसूरत पैरट यानी तोते की तस्वीर है। जनाब, फिर से देखिए यह किसी रियल तोते की फोटो नहीं है, बल्कि तोते की शक्ल ओ सूरत में रंगी एक फैशन मॉडल है। और यह कलाकारी है इटली के रहने वाले पैंतीस वर्षीय  बॉडी पेंटर मिस्टर स्टॉयटर की, जो इस कलाकारी में महारथ हासिल कर चुके हैं।

बॉडी पेंटिंग के चैंपियन हैं स्टॉयटर


हुबहू तोते की आकृति की यह तस्वीर उन्होंने हाल ही में पेश की है। स्टॉयटर अपनी इस उम्दा कलाकारी के लिए वर्ष 2012 में वर्ल्ड बॉडी पेंटिंग चैंपियनशिप की बादशाहत अपने नाम कर चुके हैं। पिछले वर्ष स्टॉयटर ने पांच लोगों को एकसाथ व्यवस्थित कर एक जीवंत मेंढक की आकृÞति को प्रदर्शित किया था।

कलाकारी है जुनून

 स्टॉयटर को बॉडी पेंटिंग का ऐसा जुनून है कि वह इस कला के द्वारा मॉडल्स की बॉडी को स्पेशल ब्रीथिंग कलर्स के साथ पेंट कर विभिन्न आकृतियों को प्रदर्शित करते हैं। स्टॉयटर के मुताबिक इस प्रकार की किसी आकृति को बनाने में शुरूआत से अंत तक करीब चार हफ्ते का वक्त लगता है।  इसके अलावा फोटो का सही एंगल चुनना बेहद मुश्किल होता है। वहीं  प्राकृतिक और रियल दिखाने के लिए ये तस्वीरें बहुत चतुराई से लेनी पड़ती है।

कठिन है मगर शौक है

स्टॉयटर  कहते हैं क मुझे बेहद खुशी है कि जब दर्शक ऐसी फोटो को देखते हैं और पूछते हैं कि यह मैनें कहां और कब खींची लेकिन वह हैरान होते हैं कि यह रियल पिक्चर नहीं है बल्कि एक मॉडल के बदन पर की गई कलाकारी है। उनके काम में सबसे मुश्किल क्या है इसके जवाब में स्टॉयटर कहते हैं कि इन तस्वीरों को हुबहू पेश करने के लिए मॉडल्स को समझाना और बैलेंस करना सबसे ज्यादा मुश्किल होता है, वहीं किसी मॉडल का लंबे समय तक एक ही अवस्था में रहना भी आसान नहीं होता। स्टॉयटर अपनी इस अतुल्य कलाकारी से अजगर तथा अनानास व  खरबूजा, जैसे फलों और अनेक फूलों की आकृति भी पेश कर चुके हैं। 

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

कमबख्त, आसमानों तक उड़ान भरती है...

दिल किसी दर्जी सा दिन को टांकता जाता है,
 जिंदगी हर घड़ी को इम्तहान करती है।
मेरे सपनों को जमा करके उछाल न दे कोई,
 यही बात  मुझे मौत से ज्यादा परेशान करती है।
 कब तलक बांध के रखें, खयालों की जुल्फ को,
 कमबख्त, आसमानों तक उड़ान भरती है।

रविवार, 30 मार्च 2014

जब मकैनिक बनी ब्रिटेन की महारानी

एलिजाबेथ अलेक्जेंडरा मैरी जी हां, यही है इनका पूरा नाम, ब्रिटेन की महारानी आज लोग इन्हें एलिजाबेथ द्वितीय के नाम से जानते हैं। 21 अप्रैल 1926  को जन्मी एलिजाबेथ  प्रिंस एल्बर्ट ड्यूक की पहली संतान थीं। उनके जन्म के समय यह कोई नहीं जानता था कि वह एक दिन एक साम्राज्य पर अपना राज चलाएंगी। आपको जानकर हैरानी होगी कि वह कभी स्कूल नहीं गर्इं। एलिजाबेथ और उनकी छोटी बहन मार्गेट को एक साथ निजी तौर पर घर के भीतर ही शिक्षा ग्रहण कराई गई।  उनकी इस शिक्षा में फ्रेंच, गणित, इतिहास और भूगोल मुख्य थे। यही नहीं संगीत  व नृत्य में रूचि के साथ साथ नृत्य कला और गयान की शिक्षा भी ली। 1936 में एलिजाबेथ के गै्रडफादर किंग जॉर्ज पंचम की मृत्यु के पश्चात उनके जीवन में बड़े परिवर्तन हुए, उनके चाचा एडवर्ड आठवें को सत्ता सौंपी गई लेकिन वह केवल छ माह ही शासन संभाल पाएं ऐसा इसलिए हुआ ,क्योंकि वह एक अमेरिकी तलाकशुदा महिला विलियम सिम्पशन  के प्यार में पड़ गए और एक दौर ऐसा आया जहां उन्हें ताज और अपने प्यार दौनों में से एक को चुनना था, सो उन्होंनें ताज को त्याग दिया और एलिजाबेथ के पिता प्रिंस एल्बर्ट ड्यूक को सत्ता सौप दी गई, और वह किंग जॉर्ज छठे बन गए। 12 मई 1937 यही वह समय था जब पिता के शासन ग्रहण करने पर एलिजाबेथ और छोटी बहन मार्गेट को छोटे क्राउन ताज पहनाए गए। उस दिन वह पहली बार अपनी महल से ब्रिटिश आवाम से मुखतिब हुर्इं।  3 स्सितंबर 1939 को द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, सुरक्षा को देखते हुए उन्हें लंदन से बाहर भेज दिया गया। वह लंबे समय तक लंदन से बाहर रहीं उन्होनें ज्यादा वक्त  विन्ढसॉर कैस्टल में बिताया जहां से 14 वर्षीय राजकुमारी ने 1940 में  उन्होेनें  युद्ध के समय बेघर हुए बच्चों को समर्पित रेडियो पर अपना पहला और प्रसिद्ध ब्रॉडकॉस्ट दिया।  मार्च 1945 तक वह 18 वर्ष की हो चुकी थी, और अब राजकुमारी एलिजाबेथ ने  आर्मी की महिला सैन्य ब्रांच एटीएस ज्वॉइन कर ली थी।  एक माह बाद उन्होनें वाहन चालक और मकैनिक की परीक्षा को पास कर लिया। अब वह आर्मी के खराब ट्रकों टैंको को रिपेयर भी करती थीं। और भारी वजन ढोने वाले आर्मी ट्रकों को चलाती थीं। क्वीन सशस्त्र बल में शामिल होने वाली तथा युद्ध के दौरान सेवा करने वाली शाही परिवार की पहली सदस्य है। हालांकि यह कार्य एलिजाबेथ ने बहुत लंबे समय तक नहीं किया। वहीं द्वितीय विश्व युद्ध मई  1945 को खत्म हुआ और बकिंघम पैलेस में जनता के समक्ष एक भारी जश्न मनाया गया, जिसमें एलिजाबेथ और मार्गेट दौनों ही शामिल हुर्इं।1947 में राजकुमारी ने प्रिंस फिलिप आॅफ ग्रीस के साथ विवाह किया। उनका विवाह समारोह लंबे युद्ध के  कई दुखद वर्षों के बाद एक खुशी का जश्न था।  7 फरवरी 1952 में किंग जॉर्ज छठे लंबी बीमारी के कारण  मृत्यु को प्राप्त हुए और एलिजाबेथ को ब्रिटेन की महारानी घोषित कर दिया गया।
30 मार्च को मुंबई एब्सोल्यूट इंडिया में प्रकाशित


एलिजाबेथ की कुछ खास बातें

  •  एलिजा बेथ द्वितीय दुनिया की सबसे ज्यादा प्रसिद्ध महिला है वह दुनिया के सबसे ज्यादा नेताओं से मुलाकात करने वाली महिला भी हैं। यही नहीं उनसे ज्यादा यात्राएं इतिहास में किसी भी राजा या महारानी ने नहीं की हैं।  उन्होंने यूनाईटेड किंगडम के 12 प्रधानमंत्रियों से मुलाकात कर चुकी हैं। 
  • महारानी एलिजाबेथ ने अपना पहला टेलिविजन ब्रॉडकास्ट 1957 को क्रिसमस की संध्या को दिया था।
  •  क् वीन को कुत्तों से बेहद प्यार है। उनका पसंदीदा डॉग कॉर्गिस है, इसके अलावा वह लेब्राडोर और स्पेनिल्स को भी पसंद करती हैं।
  •  महारानी के प्रत्येक  प्रशासनिक जन्मदिवस पर बंदूकों के फायर के साथ सलामी दी जाती है।
  •  एचआरएस किसी भी रॉयल परिवर की उच्चता का प्रतीक है जबकि एचएम यानी  महामहिम एकमात्र महारानी एलिजाबेथ को दिया गया है। 
  •  सभी  रॉयल्स नौसेना के जहाज महारानी के जहाज कहलाते हैं जैसे कि एचएमएस ओशन।
  •  सभी ब्रिटिश सिक्कों पर महारानी का ताजसहित सिर अंकित किया गया है।
  • अपने जन्मदिवस के समारोह के दौरान 31 जून 1981 को वह 17 वर्षीय युवक के द्वारा गोली चलाए जाने पर वह बाल बाल बचीं थी।
  •  26 मार्च 1976 को क्वीन एलिजाबेथ ने रॉयल सिग्नल के प्रतिस्थापित किए जाने पर नैटवर्क प्रौद्योगिकी में शामिल होकर पहला ईमेल किया था।यह ईमेल सम्रग आधुनिक इंटरनेट पर प्रसारित किया गया था। यानी ईलेक्ट्रॉनिक मेल का प्रयोग करने वाली वह राज्य में पहली नागरिक बनी थी।
  •  महारानी एलिजाबेथ ने अपनी पति का कभी नाम नहीं लिया।
  •  एलिजाबेथ ने अपने राशन कूपन को बचाकर एकत्र की गई रकम से ही अपनी विवाह की पोशाक का खर्च भरा था। इस साटन वैडिंग गाउन को  नॉर्मन हार्टनेल ने डिजाईन किया था, इस डेÑस में तकरीबन 10हजार सफेद मोती लगाए गए थे और हाथीदांत के साथ कढ़ाई की गई थी।
  • 60 वर्षो के शासनकाल में वह 116 देशों का दौरा कर चुकी हैं लेकिन उनके पास पासपोर्ट नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि सभी ब्रिटिश पासपोर्ट महारानी के नाम से ही जारी किए जाते हैं इसलिए उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं पड़ती। 
  •  अपने शासनकाल के दौरान वह अभी तक 3.5 मिलियन से भी ज्यादा चीजें प्राप्त कर चुकी हैं। 
  •  महारानी बनने के पश्चात से उन्हें अभी तक 404,500 से भी अधिक पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा जा चुका है।
  •  एलिजाबेथ 600 से भी ज्यादा चैरिटी आॅर्गेनाईजेशन की संरक्षक हैं।
  •  
    उनका जन्म 21 अप्रैल का है लेकिन यह हमेशा जून में मनाया जाता है।

सोमवार, 10 मार्च 2014

एक इंच की यात्रा .....

मीलों की यात्रा से नहीं खोजी जा सकती है दुनिया
और यह भी  जरूरी नहीं  कि
 बहुत लंबी हो यह, मगर
एक आध्यात्मिक यात्रा से
 एक इंच की यात्रा से
 जो होती है बहुत कठिन, सुखद और खुशहाल
जिससे अपने पैरों के बल पर हम जमीन पर पहुंचते हैं
और रखते हैं अपना पहला कदम
अपने ही घर में घूम लेते हैं हम दुनिया का कोना कोना।

रविवार, 9 मार्च 2014

जब मैं सफर में होती हूं,

 जब मैं सफर में होती हूं,
 तन स्थिर होता है लेकिन
 मन को मिल जाते हैं विषय अनंत।
 मिल जाती है धूमिल पृथ्वी पर कहीं थोड़ी हरियाली,
 और ज्Þारा सा खुश होने को थोड़ी खुशियां।
मिलते हैं बहुत चेहरे पहचानने को,
खामोश रहकर भी जो कह जाते हैं कई कहानियां।
मिलते हैं कतार में पीछे की ओर भागते हुए पेड़,
बिजली के खंभे और स्कूल,
 अडिग विशाल और खड़े सेवा को तत्पर।
 दाढ़ी वाले बूढेÞ मुल्ला भी मिलते हैं
 टूटी झोंपड़ी में करते खेतों की रखवाली
 लिए तलब मगरिब की नमाज़ की।
 मिल जाता है लिए कोई अखबार हाथ में
 कई तरह के मुहं बनाता हुआ पढ़ता खबरें आज की।
 मिलता हैं मां के इंतजार में
 खेत की मेढ़ पर बैठा बच्चा
 बेचैन होकर किनारे से चुनता हुआ सपनों के कंकर।
जब शाम होती है तो गांव की पगडंडियों पर
मुझे मिलती हैं बहुत सारी बालिकाएं
बढ़ते अंधेरे को पीछे धकेलकर तेजी से घर जाती हुई।
 कई बार सफर में बज उठती है मेरे फोन की घंटी
 मधुर लगती है जब तक बजता है संगीत इसमें
फिर मेरे दृश्यों को आनंद छीन लेती है यह।
अधूरी रह जाती है कविताएं मेरी
अतृप्त रह जाता है मन यर्थाथ चित्रों से ।
कल फिर से कहीं सफर पर होंगे हम
मिलेंगे मन को क ई विरले विषय,
और फिर बजेगी मेरे फोन की घंटी और
 फिर से फूटेंगे कुछ शब्द मस्तिष्क में
 फिर रह जाएगी कोई कविता अधूरी।

गुरुवार, 6 मार्च 2014

स्त्री है वह.......

On 8th March  Women's Day

ते जाते जो घटता है हर और सहा,
 किसी काम को जिसने कभी न नहीं कहा।
बेहतर दिन की आशा में हर रोज निराशा सहती है
 स्त्री है वह
 आराम नहीं है पसंद उसे न ही तुमकों तन्हा रहने देती है
 स्त्री है वह, जो गुजारती है दिन मुस्कुराते हुए
 मगर सोती है सिसकती रातें लेकर,
 स्त्री है वह
 वह, जो दिखती है बहुत मजबूत किंतु
 महसूस करती है बहुत कमजोर
 स्त्री है वह जो, खुद को संभालती है स्वयं
 गिर पड़ती है जब हर मोड़ पर
 स्त्री है वह
 खुद को खोकर मिटाती है दर्द तेरा
 स्त्री है वह जो अपने वजूद की ख्वाहिश में
एक उम्र गंवाती है।

बुधवार, 5 मार्च 2014

जब संभलता हूं ...............

 अभी अभी  कुछ शब्दों को जोड़ा,  कुछ पंक्तियां बन गई जरा गौर फरमाईए .......

 अपनी  हिम्मत का राज  मै बताता हूं,
 जब संभलता हूं तो अपनी पीठ थपथपाता हूं।
 दर्द में भी मुस्कुराता हूं  बेहिसाब,
 इस तरह जलने वालों को मैं जलाता हूं।
 गले मिलकर भी गला दबा देते हैं लोग,
 हाथ मिलाने में लोगों से अब घबराता हूं।
 डूबने से डरता था मगर डूबा तो पार हुआ,
 हर पहाड़ सी मुश्किल को अब राई बनाता हूं।
 यह हकीकत है कि हूं मैं जिद्दी बहुत,
 यही हथियार है इसके बल पर ही हर जंग जीत लाता हूं। 

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

स्मोकिंग के मामले में भारतीय महिलाएं दूसरे नंबर पर

यह बेहद अच्छी बात है कि महिलाएं तरक्की करें, लेकिन हाल ही में हुए एक सर्वे की मानें तो भारतीय महिलाओं ने जिस क्षेत्र में विकास किया है उसे शायद ही कोई सराहे। जी हां, एक शोध के अनुसार भारतीय महिलाएं स्मोकिंग के मामले में विश्व में अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर हैं। वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो स्मोकिंग करने वाली महिलाओं की संख्या में पिछले तीन दशकों में 200 फीसदी से भी ज्यादा इजÞाफा हुआ है। 1980 में भारत में जहां 53 लाख महिलाएं स्मोकिंग करती थी(चाहे वह किसी भी रूप में हो)वहीं 2012 में यह संख्या 1.21 करोड़ हो चुकी है। गौरतलब है कि आज लगभग 11 करोड़Þ व्यक्ति स्मोकिंग के एडिक्ट हैं जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं।

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

सीरियल किलिंग की खुंखार दास्ता



सीरियल किलिंग यानी किसी मनोवैज्ञानिक कारण के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों की जानबूझकर हत्या करना। इन हत्याओं के बीच कुछ घंटों से लेकर कुछ दिन सप्ताह व वर्षों का अंतराल हो सकता है। दुनिया के हर देश प्रांत और शहर में कोई कोई सीरियल किलर हुआ ही है। हालांकि इन हत्यारों की सही संख्या ज्ञात होना संभव नहीं है लेकिन कुछ लिखित दस्तावेजों के आधार पर इन्हें दो या उससे अधिक की हत्या के मामलों में  दोषी पाया गया। इनमें कुछ को कड़ी सजा भी दी गई,कुछ हत्यारे खुद हत्या का शिकार हो गए तो कुछ अपराधों की गुत्थाी आज तक अनसुलझी ही रही। इसी श्रेणी में आईए जानते हैं दुनिया के ऐसे ही कुछ सीरियल किलर्स के बारे में 

शातिरों के खौफ में रहा कोलंबिया

लुईस गाराविटो द बीस्ट के रूप में पहचाना जाने वाला लुईस एक कुख्यात अपराधी है। बच्चों का कत्ल, यातनाएं देकर लोगों को मौत के घाट उतारना, बलात्कार और फुटपाथ से सोए हुए बच्चों को उठाकर हत्या कर देना उसके मुख्य काम थे। 1990 के दशक में कोलंबिया में तकरीबन 172 से 400 लोगों का हत्यारा बना, जिमें कानूनी तौर पर केवल 138 अपराध ही साबित हो पाए, फिलहाल उस पर 20 अन्य अपराधों के मुकदमे जारी हैं जिनमें उसकी रिहाई की संभावना नहीं है। कोलंबिया के ही 65 वर्षीय पेड्रो लोपेज की बात करे, तो इसने कोलंबिया समेत इक्वाडोर और पेरू में 1969 से 1980 के मध्य 310 से साढ़े तीन सौ युवाओं को अपना शिकार बनाया। एंडीज का राक्षस के रूप में कुख्यात यह एक बाल कातिल और रेपिस्ट है जो केवल 8 से बारह वर्ष की लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बनाता था। 1980 में इसे गिरफ्तार कर लिया गया जिसके बाद 1983 में उसे110 हत्याओं का दोषी पाया गया, जिसके बाद उसने कुल तीन सौ हत्याओं को कुबूल लिया जिसके लिए उसे 1998 में जेल से रिहा कर दिया गया। बीसवीं सदी के शातिर सीरियल किलर्स में शुमार है वर्तमान में वह कहां है यह कोई नहीं जानता। डेनियल केमार्गो की कहानी एकदम फिल्मी है बचपन में वह अपनी सौतेली मां के बुरे व्यवहार से प्रेरित होकर सीरियल किलर बना और लड़कियों के प्रति नफरत से भर गया नतीजन उसने डेढ़सौ से भी ज्यादा अविवाहित लड़कियों का रेप किया और अनके बच्चों का कत्ल किया जिनमें से उसने 72 मर्डर कुबूले। पेड्रो लोपेज के साथ ही उसे जेल में रखा गया था। उसे अपनी बुद्धिमानी के लिए जाना जाता था, जिसके बल पर वह पेड्रो को लेकर जेल से फरार हो गया अ‍ेर इक्वाडोर में जाकर हत्याएं शुरू कर दीं। आखिरकार उसे 1989 में दोबारा गिरफ्तार किया गया,और जेल में मारा गया।

नहीं छोड़ा पिता को भी

 लोग अपने से बेहद मोहब्बत करते हैं लेकिन ब्राजील के इस सीरियल किलर ने अपने पिता को भी नहीं छोड़ा पेड्रो रोर्डिग्यूज फिल्हो ने ब्राजील में 1967 से  वर्ष 2003 के मध्य सौ लोगों को मारने का दावा किय है जिसमें उसने सैंतालिस कैदियों के मारे जाने की पुष्टि की गई। यही नहीं उसने अपने पिता का कत्ल भी कर डाला और उनके दिल के टुकड़े को खा लिया। उसने अपने दो पीड़ितों को केवल चौदह वर्ष की उम्र में ही मौत के घाट उतार दिया था। 1973 में उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

 येंग जिन्हाई

 2000 से 2003 के बीच यह पीड़ितों के घर में  रात के अंधेरे में घुसकर घर के प्रत्येक सदस्य को कुल्हाड़ी, मांस काटने वाले छुरे तथा हथौड़े व फावड़े के प्रहारों द्वारा मार डालता था। मॉनेस्टर किलर के रूप में प्रसिद्ध येंग को वर्ष 2004 में मारा गया।
रेड राइपर और टर्मिनेटर का कहर
एंड्रेई चिकाटिलो सोवियत यूनियन और रशिया में उसका खौफ था। रोस्तोव कसाई अथवा रेड राइपर के रूप जाना जाता था। 1978 से 1990 के बीच 53 महिलाओं और बच्चों की हत्या का दोषी पाया गया। पहले से ही किसी अपराध की सजा काट रहे एक व्यक्ति  द्वारा 1994 में उसके अपराधों के लिए उसकी हत्या कर दी। सोवियत यूनियन और युक्रेन में 1989 से 1996 के बीच 'टर्मिनेटर'  और 'सिटीजन 'ओ'  के खौफ में डूबा रहा । यूक्रेन के शैतान के रूप में पहचाना जाने वाले एनाटॉली ओनोप्रेंको को 1989 में 9 लोगों और 1996 में 43 लोगों की हत्या का दोषी पाया गया, जिसके तहत उसे मौत की सजा सुनाई गई।

 ग्रीन रिवर किलर और खूनी जोकर 

 एक ट्रक पेंटर गैरी रिज्वे  को अमेरिका के सबसे कुख्यात सीरियल किलर्स में शुमार किया जाता है।  1982 से वर्ष 2000 के बीच उसने हत्याओं को अंजाम दिया। ग्रीन रिवर किलर के रूप में पहचाना जाने वाले गैरी ने अधिकतर 90 से अधिक सेक्स वर्कर्स को अपना निशाना बनाया जिसमें 49 की हत्याओं क ा दोषी पाया गया तथा 71 महिलाओं की हत्याओं को उसने स्ंवयं कुबूल कर लिया। अमेरिका का ही जॉन वेयने गेसी 1972 और 1978 के बीच  26 पुरूषों और  33 किशोर लड़कों की हत्या करने के कारण चर्चाओं में रहा । गेसी को किलर क्लॉन यानी खूनी जोकर के रूप में पहचाना जाता था। ऐसा इसलिए क्योंकि वह किसी भी हत्या को अंजाम देने के लिए किसी भी सामाजिक आयोजन में बच्चों के मनोरंजन के लिए एक जोकर पोशाक पहनकर जाता था। गेसी को 1994 में खत्म कर दिया गया।

 30 का रहा इनका आंकड़ा

  जर्मनी के कार्ल डेनाके को एक नरभक्षी के रूप में कुल्हाड़ी से यात्रियों की हत्या करने के लिए जाना जाता था।  1900 से1924 तक उसने 40 हत्याएं की जिनमें 30 की पुष्टि हो सकी। यूनाईटेड स्टेट के डीन क्रान ने 1970 से 1973 तक एकल व सामुहिक रूप से 29 लोगों को मौत के घाट उतारा। क्रोल को दक्षिणी पूर्व टेक्सास में नौजवान लड़कों की यातनाएं देकर हत्या करने के लिए भी जिम्मेदार ठहराया गया था। वैमर पैन किलर व हैमर किलर के रूप में पहचाने जाने वाले माओयुपा सेड्रिक माके ने विभिन्न प्रकार के नुकीले, धारदार, हथियारों व उपकरणों के प्रयोग से अधिकारियों व आम लोगों को अपना निशाना बनाने के लिए 38 लोगों की हत्या का जिम्मेदार मान गया। कुछ मामलों में उसने चट्टानों द्वारा पीड़ित की जान ली तथा एक हथौड़े से एक दर्जी की जान ली। उसे कुल 35 हत्याओं का दोषी पाया गया। हंगरी के बेला कीस  ने 1912 से 1916 के बीच 24 हत्याओं को अंजाम दिया। 24 महिलाओं के शव उसके घर से बरामद होने के बाद उसे सजा सुनाई गई। इसके बाद वह 1916  में जेल से भागने में सफल और हमेशा अज्ञात रहा। गौरिल्ला किलर और डार्क स्ट्रेंजलर के रूप में यूनाईटेड स्टेट में ईअरले नेल्सन 1926 में 25 महिलाओं का हत्यारा बना। वह केवल मकान मालकिनों को ही अपना शिकार बनाता था। जनवरी 1928 को उसे फांसी दे दी गई। इटली के डोनाटो बिलिंसिया ने 1997 से 1998 के बीच केवल छ माह के दौरान 17 लोगों को मुख्य रूप से 17 वैश्याओं का हत्यारा बना।उसे प्रॉस्टीट्यट किलर और लिंगुरिया मॉनेस्टर के रूप में जाना जाता था। डोनाटो को आजीवन कारावास की सजा हुई। 
ईरान के महोम्मद बिजेह ने वर्ष 2004 में बलात्कार के बाद 20 किशोर लड़कों की हत्या कर डाली जिसके लिए वर्ष 2005 में भीड़ के द्वारा पत्थर बरसाकर मार दिया गया। उसे तेहरान डेजर्ट वैम्पायर के रूप मे जाना जाता था।

 1900  ई से पूर्व के कुछ सीरियल किलर्स 

जिलेस डी रेज- 1404-1440- 80 से 200 लोगों की हत्याओं का दोषी जिनमें केवल चालीस लोगों के  शव ही बरामद हो सके।
पीटर नायर्स- 1581 - 544  हत्याओं के मामलों का दोषी जिनमें 24 प्रेगनेंट महिलाएं भी शामिल थी जिनकी हत्या के बाद वह उनके भ्रूण को नरभक्षण और काले जादू के प्रायोजन के लिए इस्तेमाल किया करता था। 
एलिजाबेथ बेथॉरी- 1560-1614- इनका नाम साढेÞ छ सौ कर्मचारियों को प्रताड़ित कर मौत के घाट उतारने के लिए अपराध लिस्ट में शामिल है। 
हार्पे ब्रॉदर्स- 1768-1799- 40 पुरूषों, महिलाओं  व बच्चों के  हत्यारे। 
जॉर्ज चेपमैन- 1897-1902- इन पर 3 महिलाओं को जहर देकर मार देने का आरोप था।
डारिया सॉल्टिकोवा-1730-1801-  138 कर्मचारियों की हत्या के संदेह में दोषी करार दिए गए।  
ठग बेहरम- ठग्गी कल्ट दुनिया के सबसे शातिर अपराधियों में से एक है। वह भारत का एक कुख्यात हत्यारा था।  1790 और1840 के बीच उसने अपने रूमाल से गला घोंटकर हत्या करने के तरीक से 931 लोगों को मौत के घाट उतारा था। आखिरकार उसे 1940 को फांसी देकर मार डाला गया

क्या है सीरियल किलिंग  

सनक और सीरियल किलिंग आज भी शोध का विषय बने हुए हैं। जबकि यह निश्चित नहीं हो पाया है कि आखिर ऐसे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से कोई सीरियल किलर बन जाता है।  शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों की माने तो अधिकतर ऐसे बच्चे जो बचपन में किसी दुर्व्यवहार, उपेक्षा, अस्वीकृति, शोषण आदि का शिकार हुए हों वह बड़े होकर हिंसक प्रवृति के हो जाते हैं,जिसका नतीजा सीरियल किलिंग के रूप में सामने आता है। शोधकर्ता इस पर लंबे समय के शोध कर रहे हैं लेकिन कोई ठोस नतीजे सामने नहीं आए। हां  यह साबित जरू र हुआ कि सभी सीरियल किलर मनोरोग से ग्रस्त होते हैं लेकिन सभी मनोरोगी सीरियल किलर्स नहीं होते हैं।अधिकतर शोध यही दर्शाते हैं कि मनोरोगियों में आम लक्षण  जो परिवार के इतिहास से जुड़े अथवा अनुवांशिक हो सकते हैं। यहां तक कि पर्यावरण, माहौल व अनुभव से भी जुड़े हो सकते हैं लेकिन हिंसक व्यवहार के लिए एक व्यक्ति को दानव के रूप में परिवर्तित करने के लिए केवल मानसिक असामान्यताएं, मनोरोग, अनुभव और पर्यावरण एक बड़ी भूमिका निभाते हैं। 1984 में फोरेंसिक साइंसके इंटरनेशनल एसोशिएशन के लिए एक पत्र में एफबीआई के एजेंट राबर्ट रेसलर और उनके कुछ सहयोगियों ने कुछ सीरियल किलर्स की दस विशेषताओं व सामान्यताओं को सूचीबद्ध किया। इनमें नब्बे प्रतिशत में ऐसे श्वेत पुरूष थे, जिनका आईक्यु सामान्य से बेहतर अथवा उच्च था। यानी इतनी इंटेलीजेंसी के बावजूद ये लोग अपने स्कूलों में खराब रहे या उन्हें नौकरी पाने में कठिनाई हुई।  ये अधिकतर अस्थिर व बर्बाद परिवारों के बच्चे थे। उन्हें अपने पिता या किसी व्यक्ति विशेष अथवा वर्ग से सख्त नफरत थी। ये भी समानताएं देखी गई ये सभी किसी अजनबी परिवार के सदस्य के द्वारा भावनात्मक, शारिरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किए गए हों , गाली गलौज के शिकार हुए हों अथवा उनका शोषण हुआ हो। अधिकतर सीरियल किलर्स के पुराने रिकॉर्ड को देखने पर पता चलता है कि ये पहले से ही मानसिक समस्याओं के शिकार रहें हैं। कम उम्र में यौन सक्रियता, पॉर्न में गहरी रूचि पाई गई यहां तक इनमें आत्महत्या के प्रयास की दर भी काफी उच्च पाई गई। आग से बचपन में इनका लगाव इन्हें सामुहिक विनाश के लिए प्रेरित करनेकी पहली सीढी था। 

 क्यों बन जाता है कोई सीरियल किलर

 क्र ोमोसोम अब्नार्मेलिटी
 अमेरिका के कैंब्रिज यूनिवर्सिटी  डा0 हेलन मॉरीसन के अनुसार ऐसा कोई देश नहीं हैं जहां सीरियल किलर्स न हुए हों लेकिन क्या कोई वैज्ञानिक कारण भी हैं जो सीरियल किलिंग के लिए प्रेरित करते हैं। यही जानने के लिए उन्होनें करीब 135 सीरियल किलर्स के इंटरव्यू किए। यहां तक कि कुख्यात सीरियल किलर जॉन वेयने गेसी के मस्तिष्क के टुकड़े को जांच के लिए भी रखा ताकि यह जान सकें कि क्या कोई जीन इसके लिए जिम्मेदार हो सकता है। लेकिन मॉरीसन के मुताबिक सीरियल किलर्स में एक गुणसूत्र विषमता होती हैं जिसमें वह युवावस्था के दौरान खुद को अभिव्यक्त करने के लिए हिंसक प्रवृति का सहारा लेता है। अधिकतर हत्यारों ने अपने पहले शिकार युवावस्था के दौरान ही किए हैं।  मॉरीसन के अनुसार सीरियल किलर व्यक्ति के जीवन में डर, दर्द आतंक, प्रशंसा, खुशी के लिए कोई स्थान नहीं होता है वह अपने शिकार को एकमात्र वस्तु समझते हैं। यही नहीं वह अपने पीड़ित की हत्या किसी उद्देश्य के लिए भी नहीं करते बल्कि वह उसे एक वस्तु मानकर खत्म करना चाहते हैं। ऐसा बहुत बार हुआ है जब सीरियल किलर ने अपने शिकार को किसी प्रयोग के लिए इस्तेमाल किया है यहां तक कि इससे संबंधित कुछ नोट भी उपलब्ध हुए हैं। जॉन वेयने गेसी की बात करें तो वह हत्या के बाद पीड़ितों पर प्रयोग करता था। मॉरीसन के अनुसार यह केवल पूर्ण मानवता के अभाव में ही हो सकता है न कि मनोरोग के अंर्तगत क्योंकि मनोरोगी भावनाओं को समझने की शक्ति नहीं खोता।

 कहीं आप तो नहीं छिपा है सीरियल किलर

 शारीरिक चोट
 जानवरों पर अपनी कल्पनाओं का अभिनय करना
 वयस्कता का छिपकर विकास
 कामुक गतिविधियों को प्राथमिकता
 नकारात्मक कल्पनाओं में जीना
 अलग और अकेले रहना
 बचपन में बिस्तर गीला करने की समस्या
 सेक्सुअली स्ट्रेसफुल ईवेंट से गुजरा बचपन
  बचपन के दौरान मानसिक शोषण 
 शराब और मादक पदार्थाें का सेवन

 शरीर पर लगी चोट में खासतौर पर  किसी दुर्घटना या अन्य रूप से सिर में लगी चोट किसी  बच्चे के व्यवहार को बदलने में सहायक होती है। यही नहीं जन्म के दौरान बचपन या दुर्घटना में सिर में लगी चोट से मस्तिष्क के हाईपोथेलेमस या टेम्पोरेल लोब को नुकसान पहुंचता है जो आक्रामक और हिंसक व्यवहार के लिए जिम्मेदार होता है। 70 प्रतिशत  सीरियल किलर्स बचपन में हेड इंजरी का शिकार हुए थे। सभी सीरियल किलर्स यहां तक कि 99 प्रतिशत ने अपनी हिसंक कल्पनाओं को जानवारों पर अभिव्यक्त करते थे। 57 प्रतिशत  सीरियल किलर्स को एक सीमित उम्र तक बिस्तर गीला करने की समस्या रही है। सामाजिक अलगाव कई हद तक व्यक्ति को सीरियल किलर बनने की और प्रेरित करता है। 46 प्रतिशत सीरियल किलर्स ने हाई स्कूल से आगे तक पढ़ाई नहीं की थी।  50 प्रतिशत भावनात्मक शोषण व उपेक्षा का शिकार हुए थे। 70 प्रतिशत सीरियल किलर्स ने बचपन में अपने घरों में मादक पदार्थाें से संबंधित समस्या का अनुभव किया था।