शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

ठंड में बरसात नाम से ही डर लगता है इसलिए बाहर ही नहीं निकले, मगर घर की गौरया ने कल हुई  बारिश के खूब लुत्फ उठाया जरा देखो तस्वीरे 

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार की सर्वाधिक चर्चित ग़ज़ल ...

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है


एक चिंगारी  कही से ढूंढ लाओ दोस्तो
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है


एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है


एक चादर सांझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है


निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है


दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

वर्ल्ड फेमस कार्टून...

रोशनी के लिए...

जनसंख्या और भवष्यि..
 सरहदों की बंदिशें...
सुसाईड से पहले..

अथ रोड़वेज कथा यात्रा....



उत्तर प्रदेश राज्य परिवहन निगम अपनी कामयाबी की जिन ऊंचाईयों को छू रहा है। वह वाकई काबिले तारीफ है और यदि इसकी कार्यकुशलता की बात की जाए तो इसकी निपुणता का कोई सानी नहीं है। वहीं सेवा-भाव , तत्परता, समयबद्धता, विनम्रता व ईमानदारी जैसे तमाम अनुकरणीय गुण प्रदेश के परिवहन निगम में कूट कू ट-कर भरे हैं। यहां की बसें न केवल शानदार, बल्कि जानदर भी  हैं  और कर्मचारी वर्ग का तो जवाब ही नहीं। बसों की तो जितनी तारीफ की जाए उतनी ही कम है, इतनी नाजुक, खूबसूरत और नाज-नखरे वाली बसें कि डिपो से निकलकर दो-चार कदम चलते ही इनकी सांस फूलने लगती है। गलती इनकी नहीं है, दोष तो सड़कों का है। अब हिंदुस्तान की खटारा सड़कों पर भला ये लाजवंती नाजनीनें चलें  भी तो कैसे!
निगम के हालात भी बयां कर ही लेते हैं। आप निगम में पहुंचे नहीं कि जोर-शोर से आपका अतिथि सत्कार और आव भगत शुरू हो जाती है। यात्री प्रतीक्षालय में बैठे गन्नारस, चाय, टॉफी-बिस्कुट और कोल्ड ड्रिंक वाले पलकें बिछाए आपका इंतजार करते नजर आते हैं। अब अगर इनके सेवा भाव के कारण आपको बैठने या खड़े होने की जगह न मिले तो इसमें निगम का क्या कुसूर, इनके न होने का खामियाजा भी तो आप ही को भुगतना पड़ सकता है, इन्हीं की बदौलत तो आपको अपना सामान छोड़कर खाद्य सामग्री का इंतजाम नहीं करना पड़ता। निगम के प्रांगण में खड़े सांडों, सुस्ताते कुत्तों व पॉलिथीन चबाती गायों को आप भला कैसे भगा सकते हैं। जीवों पर दया करने का पाठ बचपन से ही आपको पढ़ाया जाता है, तब भला निगम इतना असहिष्णु कैसे हो सकता है।
 अब इंक्वायरी लिखे काउंटर पर किसी यात्री वाहन की जानकारी लेने के लिए आप वहां पधारें, तो पहले तो आपको परेशान करने के लिए वहां कोई मौजूद नहीं होगा। बेझिझक खड़े होकर आप वहां की शोभा को निहार सकते हैं और लकीली यानी भाग्यवश आपको कोई मिल भी गया, तो वह पहले तो आपको ऐसे प्रेम से निहारेगा, जैसे आपने उसका कुछ उधार लेकर वर्षों से दिया न हो। फिर वह आपको बिना डांटे-फटकारे, अदब में नीचे सिर झुकाए, तेजी से जो बताना है बता देगा, अब आपको समझ में न आए तो इसमें उसका क्या दोष! आपकी ही गलती है जो ठीक से नहीं सुन पाए।
आप बस में सवार हो जाइए। बस में चढ़ते ही आप चैं-पैं के शिकार हो जाएंगे। आपके बैठते ही चूरन, किताब, दंतमंजन, घड़ी व टार्च बेचने वाले बारी-बारी से अपनी लयबद्ध लेकिन ककर्श आवाज से आपका मनोरंजन करेंगे। अब भला ये नहीं होंगे, तो प्रस्थान के इंतजार में इतनी देर खड़ी रही बस में आपका एंटरटेनमेंट कैसे होगा। थोड़ी ही देर में आपको बस में इतने प्रेम से आगे या पीछे खिसकाया जाएगा, कि आपको यह रोडवेज की बस अपने गंतव्य तक पहुंचते-पहुंचते मां की गोद जैसा आराम देगी और आप शहर की सिटी बस के आराम को तो भूल ही जाएंगे। परिचालक ओवर लोडिंग थोड़े ही करते हैं, ये तो आप ही हैं जो दूर-दूर से उड़कर पतंगों की तरह बस स्टैंड पर आ पहुंचते हैं। अब परिचालक न बैठाकर पाप का भागी वह  क्यों बने!
 यदि आप महिला सीट पर किसी पुरुष को बैठा देखें, तो कृपया इसे अनैतिक न कहें, क्योंकि यह शब्द तो निगम के किसी कानून में है ही नहीं। बस के चालक व परिचालक के व्यवहार से तो आपको सीख लेनी चाहिए, चाहे वह चालक का अपने पड़ोसी वाहन चालकों को गाली देना हो या परिचालक का यात्रियों द्वारा खुले पैसे न देने पर बेअदबी से पेश आना हो। यहां तक कि कुछ दूरी के लिए बस में सवार एक महिला कांस्टेबल से हाथापाई करने तक की बात ही क्यों न हो। हां यह अलग बात है कि भले ही खाकी रंग के कपड़ो वाले उनके काकाजी एक रुपया दिए बिना कितनी ही दूर जा सकते हैं। आखिर यही तो सिखाते हैं कि ‘हक’ कैसे मिलता है। खैर, जो भी  हो, आपको अपनी यात्रा पर जाना है, फिर मिलेंगे, फिलहाल तो यही कहेंगे कि उत्तरप्रदेश परिवहन निगमश्री की इन बसों और कर्मचारियों के साथ  आपकी यात्रा मंगलमय हो।

सोमवार, 2 जुलाई 2012

क्या आप भी हिंदी प्रेमी हैं.........


 एक बार हम लखनऊ प्रस्थान करने के लिए मेरठ रेलवे स्टेशन पहुंचे, वहां पहुंचकर हमने टिकटमास्टर से कहा, 'हे यात्राधिकार प्रमाणपत्र प्रदायक महोदय', कृपया आप हमें लखनपुर प्रस्थान हेतु एक 'लोहपथगामिनि यात्राधिकार प्रमाणपत्र' प्रदान करने की कृपा करें। इतना सुनकर वह टिकट मास्टर हमें ऐसे घूरने लगा जैसे हम उससे किसी दूसरे ग्रह की भाषा में बात कर रहे हों और लखनपुर नाम का शहर इस हिंदुस्तान में हो ही न, वह बोला, क्या है हिंदी में बताओ ? फिर हमें अचानक चौथी कक्षा की पुस्तक का ख्याल आया और सोचा कि अरे लखनपुर का पूर्वनाम लखनावती था और बाद में लखनऊ कर दिया गया तथा 'यात्राधिकार प्रमाणपत्र प्रदाता' को टिकटमास्टर कहा जाता है। हमने फिर से टिकट कांउटर पर जाकर उस टिकट महाशय को लखनऊ की एक टिकट देने को कहा, तब जाकर उसने  बेरहमी से घूरते हुए हमें एक टिकट थमाई।
 टिकट लेकर में हम स्टेशन से बाहर आ गए और सोचा कि एक प्याला चाय पी ली जाए। चाय वाले की दुकान में प्रवेश कर हमने एक पात्र 'दुग्ध शर्करामिश्रित पेय पदार्थ' देने के लिए चाय वाले से कहा, तो वह बोला 'हमारी दुकान में नहीं है, बराबर में पूछ लो ।' हमने उससे पूछा कि 'आप यह क्या बना रहे हैं' तो वह बोला 'यह तो चाय है' हमने कहा कि 'हमे यहीं तो चाहिए' वह फिर से मुहं फेरकर अन्य लोगों को चाय देते हुए बोला कि 'इसे चाय या अंगे्रजी में टी कहते हैं, आप पता नहीं कौन सा नया नाम बता रहे हैं।' खैर, हमने अगर नहीं पूछा होता तो 'दुग्धशर्करामिश्रित पेय पदार्थ' ग्रहण करने के चक्कर में घूमते ही रहते चाय की दुकानों पर। चाय पीकर हमने आगे मार्ग की तरफ प्रस्थान कि या ।
ट्रेन के आने में अभी काफी समय था, इसलिए थोड़ा समय व्यतीत करने हेतु हम मार्ग की तरफ चल निकले, रास्ते में हमे याद आया कि हम घर से पान लेकर चलना भूल गए हैं और हमें खाने के बाद पान खाने की आदत है। हमने सोचा कि यहां कहीं से ले लेंगे, लेकिन हमें कोई दुकान नहीं दिखाई पड़ी। तभी हमारी नजर एक व्यक्ति पर गई, हमे लगा कि शायद वह व्यक्ति हमें पान की दुकान जरूर बता देगा। हमने उसके पास जाकर कहा कि श्रीमान 'क्या आप हमें इस विषय में अवगत करा सकते हैं, कि यहां  'तांबूल विक्रयशाला' किस दिशा में हैं? वह मुस्कुराते  हुए बोला, जी हां जरूर आप आगे आ गए हैं।  पीछे की ओर दाहिने हाथ पर मुड़कर थोड़ी ही दूरी पर है। वह। हम उसके दिशानिर्देशानुसार वहां पहुंचे तो  एक एक बड़ी सी इमारत पर 'महाराजा अग्रसेन धर्मशाला' लिखा पाया लेकिन वहां पान की दुकान दूर-दूर तक नहीं थी। उन श्रीमान की हंसी देखकर हमें लगा कि वह हमारी बात को समझ गए थे, लेकिन उन्होंने 'विक्रयशाला' को 'धर्मशाला' समझा होगा और हमें यहां भेज दिया।  ट्रेन के आने में भी काफी कम समय बचा था, सो हम बिना पान खाए ही वहां से चल दिए और स्टेशन पहुंच गए।
 स्टेशन पहुंचकर  हमें याद आया कि हमारा चश्मा हमारे पास नहीं था। यानी टिकट काउंटर पर ही  भूल आए थे। अब भूलते भी क्यों न हमें 'भुलक्कड़पन' की बीमारी विरासत में जो मिली थी। हम तेजी से भाग कर जैसे ही टिकट काउंटर पर पहुंचे तो टिकटमास्टर, जो हमसे  पहले ही काफी परेशान हो गया था ने हमें दूर से ही देखकर मुंह बना लिया, फिर भी उसे हम से बात करनी पड़ी। आखिर जनता की सेवा उसका फर्ज जो था और हम भी भला बिना चश्मा लिए कैसे चले जाते जबकि हमें मालूम था कि हमारा चश्मा वहीं रह गया था, सो फिर से पहुंच गए। हमने विनती स्वरूप हे श्रीमान ही कहा था कि वह तमतमाते हुए बोला 'अब कहां के लिए टिकट चाहिए, फिर आ गए दिमाग खाने को। हम बोले कि श्रीमान हमें टिकट नहीं चाहिए दरअसल, हम अपना 'कर्णस्थित नासिकाचिपकल दृश्ययंत्र' यहां 'त्रुटिवश' भूल गए थे। क्या आप हमें वह प्रदान करने की कृपा करेंगे। टिकट मास्टर हमें फिर से घूरते हुए अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया। उसे हमारी कोई भी बात समझ में नहीं आई फिर वह बोला कि आपने अभी सबसे बाद में क्या कहा था कि भूल गए थे। भूल शब्द से टिकटमास्टर को याद आया कि हमारा चश्मा वहां रह गया था और वह चश्मा उठाकर हमें देने लगा और बोला  ये लो अपना चिपकल-सिपकल यंत्र, ऐनक कह देते तो भी समझ जाते हम सरकारी दफ्तर में बैठते हैं इतनी हिंदी तो जानते ही हैं।
 हम टिकट मास्टर का धन्यवाद करते हुए अपना चश्मा लेकर टिकट काउंटर से हटे तो सुनाई पड़ा कि हमारी ट्रेन  एक घंटा विलंबित है। हमने सोचा कि चलो इतने समय में हम अपने वहीं स्टेशन के नजदीक रहने वाले एक मित्र से मिल आएं। इसके लिए हमें एक रिक्शा की आवश्यकता महसूस हुई, क्योंकि समय की बचत भी करनी थी और मित्र से मिलकर वापस भी आना था। हम स्टेशन से बाहर आए तो एक रिक्शा वाले के पास जाकर कहा, हे श्रीमान 'द्विचक्रयान चालक' क्या आप हमें शिवविहार कॉलोनी तक छोड़ने की कृपा करेंगे। रिक्शा वाले ने चालक को चालाक समझा और हम पर चिल्लाते हुए बोला कि  चालाक तू और तेरा बाप।
  इतना कहकर वह आगे बढ़ गया। और हम हिंदी प्रेमी वहीं स्टेशन पर खड़े उसे दूर जाते ताकते रहे।हमें  अपने हिंदी प्रेमी होने पर शर्म आ रही थी क्या आप भी हमारी ही तरह हिंदी प्रेमी हैं।

बुधवार, 27 जून 2012

अकूत दौलत के मालिक ये मंदिर.....







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  शास्त्रों के अनुसार कुबेर को देवताओं का कोषाध्यक्ष माना जाता है  इसलिए कुबेर देव कितनी धन दौलत के मालिक होगें, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होगा। धन दौलत की स्थिति में भारत के कुछ मंदिर भी इसी स्थिति में हैं, यानी ये मंदिर बेहिसाब दौलत के मालिक हैं। भारत को देवी और देवताओं की भूमि कहा जाता है। यहां के मंदिरों के प्रति भी लोगों की गहन आस्था है।  यहीं नहीं मंदिरों में भक्तों द्वारा यहां के मंदिरों में भेंट की जाने वाली चीजों की कोई सीमा नहीं है, ईश्वर के प्रति इसी आस्था और सर्मपण के साथ यहां ईश्वर के भक्त अत्यंत कीमती चीजें तक दान करने से नहीं घबराते हैं । भारत के ऐसे ही पांच मंदिरों के बारे में आइए जानते हैं जिन्हें भारत के सबसे अमीर मंदिरों की श्रेणी में रखा गया है।

 पदमनाभस्वामी मंदिर केरल -

 श्री पदमनाभस्वामी मंदिर  भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व का सबसे अमीर मंदिर बन गया है। मंदिर से प्राप्त गहने जेवर कीमती  पत्थर आदि की कुल मूल्य का करीब एकलाख करोड़ रुपए का खजाना हासिल हुआ है  कुछ समय पहले तक सबसे अमीर मंदिरों की सूची में तिरूपति बालाजी के मंदिर को पहले पायदान पर रखा गया है, लेकिन केरल क पद्मनाभ मंदिर से मिले खजाने के बाद यह इस पायदान से नीचे आ गया है।  पद्मनाभ के मंदिर से करीब एक लाख करोड़ रूपए से ज्यादा का खजाना मिला है तथा इसका अभी एक तहखाना खोला जाना बाकी है जिसमें इस मंदिर की  प्राचीन वस्तुओं की कीमत को आंका जाएगा। गौरतलब है कि यह खजाना त्रावणकोर के राजाओं का है, कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह मंदिर बेशुमार दौलत का स्वामी है।

तिरूपति बालाजी -

 तिरूपति बाला जी मंदिर भारत के सबसे पवित्र व दुनिया के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। यह दक्षिण भारत के प्रमुख तीर्थ के रूप में भी जाना जाता है। भक्तों द्वारा दिए गए चढ़ावे की दृष्टि से देखा जाए ,तो तिरूपति बालाजी पहले नंबर पर हैं।  इस मंदिर की वार्षिक आय 500 करोड़ रूपए से भी कहीं अधिक आंकी गई हैं। यहीं नहीं मंदिर की संपत्ति में करोड़ों रूपए के साथ ही हजारो  किलो सोना व चांदी भी शामिल है।  तिरूपति बालाजी की  संपत्ति के विषय में कहा जाता है कि यहां कुल  पचास हजार करोड़ की संपत्ति है। यह कहा जाता है कि  लोग यहां हीरे से भरे बैग तक भगवान वैंकटेश्वराय के चरणों में भेंट करते हैं । यही नहीं इस मंदिर के देवता करीब 1000 किलोग्राम गहने पहने हुए हैं । करीब 50,000 से एक लाख की संख्या में तीर्थयात्री हर दिन इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।

सिरडी साईबाबा-

 धन दौलत के मामले में सिरडी के सार्इं बाबा का मंदिर भी कुछ कम नहीं हैं। यहां भी प्रतिवर्ष करोड़ों का चढ़ावा आता है।  आंकड़ों के अनुसार यहां प्रतिवर्ष 400 करोड़ रूपए से भ अधिक का चढ़ावा आता है।   शिरडी का सार्इंबाबा का मंदिर महाराष्ट्र में स्थित भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों  में शामिल है। इस मंदिर  प्रयुक्त 24.41 करोड़ के सोने के साथ 3.26 करोड़ की चांदी व 6.12 लाख के चांदी के सिक्के व 1.288 करोड़ रुपए के सोने के सिक्कों व 1.123 करोड़ की कीमत के  गोल्ड पैंडेंट  शामिल हैं।

 सिद्धिविनायक मंदिर मुंबई-

श्री सिद्धिविनायक गणपति मंदिर भगवान गणेश को समर्पित एक हिंदु मंदिर है। इस पवित्र तीर्थ  के लकड़ी के दरवाजों पर अष्टविनायक की छवियां सिने विजन से साथ खुदी हुई हैं। मंदिर के अंदर की छत के भाग पर सोने की परत चढ़ी हुई है। फिक्स डिपोजिट में इस मंदिर की वार्षिक आय 46 करोड़ रुपए से 125 करोड़ रुपए है।

 गोल्डन टेंपल अमृतसर-


 गोल्डन टेंंपल यानी स्वर्ण मंदिर सभी धर्मों खासकर सिक्खों के लिए पवित्र तीर्थस्थान है। यहां भक्तजन गुरूग्रंथसाहिब को कवर करने के लिए करीब 28,000 से 125,000 रुपए तक के रूमाल भेंट करते हैं। ये रूमाल  कीमती स्टोन से की गई  कशीदाकारी के साथ सिल्क रेशम और मखमल के बने होते हैं। अमावस्या संक्रांत दीपावली बैसाखी और गुरूपर्व जैसे अवसरों पर यहां तीर्थयात्रियों की संख्या अधिक होती है। मंदिर के अधिकारियों के अनुसार करीब एक से डेढ लाख व्यक्ति इन अवसरों पर इस मंदिर के दर्शन करते हैं। करीब 355,000 भक्तजन प्रतिदिन इस मंदिर में आते हैं।



गुरुवार, 14 जून 2012

नौकरी धरी कहां हैं........।


 घर से बाहर निकलने के बाद आदमी ऐसे काम भी कर जाता है, जो उसने कभी न किए हों। करता भी न हो लेकिन दिमाग में ख्याल तो पाल ही लेता है। हमारे लिए मॉर्निंग वॉक जैसी चीजें इसी श्रेणी में आती हैं। अभी कुछ दिनों पहले की बात है, हम एक कम आबादी वाले शहर के मकान की ऊपरी मंजिल में रह रहे थे हमारी तीन और सहेलियां हमारे बाजू वाले कमरे में रह रही थी अचानक एक दिन हमारी तीन सहेलियों ने वॉक पर जाने का मन बनाया। अरे हां, वॉक मतलब वहीं धीरे-धीरे चलकर बात करते हुए  सुबह या शाम के समय किसी पार्क अथवा सड़क के किनारे पर पर निकल पड़ना, यानी उनके विचार से हम सवेरे अपनी प्रेमप्यारी निद्रा को छोड़कर उनके साथ आस-पास तक टहलने जाएं। अब टहलने जाने के लिए तो सुबह उठना जरूरी है अब हमारी बला से कुछ हो जाए, मगर जब तक ख्वाबों के परिंदों हमारी आंखों के आशियानें से न उड़ जाएं तब तक क्या मजाल कि हम पलकें भी हिलाएं।
बिस्तर से सवेरे सवेरे उठना दरअसल हमे दुनिया का सबसे बड़ा अपराध लगता है। जिस बिस्तर ने हमें रात भर चैन की नींद सुलाया सुबह उठकर उसे झट से छोड़ देना हमें बहुत अखरता है। खैर, कई आखिरी करवटें बदलने के बाद आखिरकार फिर से वापसी का वादा कर बिस्तर से विदा लेनी पड़ती है।  जिस सुबह टहलने का वादा तय हुआ था वह भी आ गई हमें लगा कि कहीं कहीं हमने गलत बात पर तो  सहमति नहीं दे दी। तीनों सहेलियां कमरे में दाखिल हुर्इं एक ने हा,हा,हा करते हुए आईने के सामने बाल संवारना शुरू कर दिया, शायद उसे किसी बात पर हंसी आई होगी, हम नींद में सुन नहीं पाए। दूसरी हमें उठाने की जुगत  में थी, क्योंकि उसे पता था कि हम बजते हुए अलार्म को भी बंद करके कुभकरण की नींद सो जाते हैं। तीसरी जो थोड़ी सफाई पसंद थी ने रात भर से सिरहाने रखे चाय के कप को देखकर हमें भला बुरा कहना शुरू किया। दरअसल उस कप में चाय खत्म होने के बाद भी कुछ मिठास बची रह गई थी, चींटियां और झिंगुर उसका खुशी से आनंद ले रहे थे, अब उन्हें क्या मालूम था कि कोई उनके रंग में भंग भी कर सकता है और उन्हें बेरहमी से बाहर कर देगा। खैर,  उसने छी....भई हद है तुझसे तो, सुधर मत जाना यह कहते हुए कप को बाहर किया। हमारे कानों ने तो अपना काम शुरू कर दिया था मगर आंखें अभी खुलने का नाम नहीं ले रही थी फिर भी जबरदस्ती एक लंबी सांस भरते हुए हमने अपनी आंखे खोली और  दोस्तों से कहा कि तुम चलो हम अभी आते हैं। हमारी खुशनसीबी थी किसी ने हमारे साथ जबरदस्ती नहीं की। उन्हें जाता देख हम थोड़ा मुस्कुराए कि चलो अब दो मिनट और लेटे रहेंगें। लेकिन ज्यादा पीछे रह जाने के डर से हमने जल्दी से उठकर कोने में पड़े स्लीपर पहने और कमरे का दरवाजा लगा जल्दी से दोस्तों के दिशानिर्देश का पालन किया, ध्यान आया कि मोबाइल भूल गए बिना मोबाइल के बिना बाहर जाना हमें गंवारा नहीं क्योंकि हम उसी से फोटोग्राफी और दूरसंचार दौनों का कार्य लिया करते थे सो दोबारा दरवाजा खोलना पड़ा फिर लगाना भी पड़ा। सुबह सुबह इतनी मशक्कत दिमाग खराब करने के लिए काफी थी सीढ़ियों से उतरते वक्त दिखा कि तीनों काफी आगे निकल चुकी थी, सो हमने तेजी से पांव रखे और बाहर रोड पर पहुंचे गर्मी के मौसम की वजह से  सड़क के किनारे की मिटÞटी रेत में परिवर्तित हो गई थी। हमने थोड़ा तेज चलना चाहा तो पांवों में थोड़ी रेत भर जाने से कभी न गलने वाली प्लास्टिक वाली स्लीपर नाराज हो गई और पांव से सरक-सरक जाती।
 नकाब सरकने के बारे में तो शायरों ने न जाने कितना लिखा, पांव के नीचे से जमीन सरकने की बात भी लिखी गई मगर चप्पल सरकने की बात किसी ने नहीं लिखी। अब क्या आलम था हम ही जाने हमने तीनों को आवाज देकर रोका तब जाकर उनमें शामिल हो पाए। हमारी व्यथा सुनकर सभी ने हमपर ही दोष मढ़ना शुरू कर दिया किसी ने चप्पल बनाने वाली कंपनी और मैटिरियल पर अंगुली  नहीं उठाई। बस मन ऊब गया, सो मजबूरी में प्रकृति की हरियाली को निहारने का नाटक करते हुए कभी कभी उनकी बातों पर हां, हूं कर देते। उधर सूर्यदेव भी अपनी लालिमा लिए समान भाव से रोशनी बांटने के लिए आ पहुंचे जैसे किसी कंपनी में कोई कर्मचारी पहले दिन नए उत्साह और जोश के साथ अपनी ड्यूटी ज्वाईन करता है वह अलग बात है कि वह कुछ दिनों बाद हठी और कामचोर हो जाता है।
कुछ ही  दूरी पर एक चाय की दुकान थी साथियों का मन हुआ कि वहां बैठकर चाय पी जाए । वहां पहुंच गए देखा कि दो बुजुर्ग पहले से ही चाय की आनंद ले रहे थे। अखबार वाला भी बड़े तैश में अखबार ऐसे पटककर गया कि जैसे चायवाले ने उसका कितने महीनों का उधार न दिया हो। खैर, सबसे पहले हम अखबार की तरफ लपके पत्रकारिता से खास लगाव जो था भले ही नौकरी के लिए जद्दोजहद चल रही थी, मगर किसने गलत हैडिंग दिया है या किस अखबार में कितनी भाषाई अशुद्धियां हैं यह तो हम ऐसे बखान करते कि जैसे इन अखबारों के संपादक हम ही हों। अखबार कबूतर के पंखों की तरह वहां बैठे लोगों में एक एक पन्ना करके फैल गया। आज अखबार में  शहर की बिजली  के रात भर गुल रहने की खबर अहम थी। प्रधानमंत्री का विदेश दौरा रात भर से ही चर्चा का विषय बना हुआ था। आगरा में अपराध की घटना को सुनकर दौनों बुजुर्ग आगरा में इस तरह की घटनाओं से पर्यटकों की आमद घटने को लेकर काफी चिंतित दिखाई दिए। चाय बनकर तैयार हो गई थी। चाय फिर से उसी कभी न गलने वाली प्लास्टिक से बने गिलास में मिली थी जिससे बनी चप्पल हमारे पांवों से सरक-सरक जा रही थी हमें डर था कि कहीं चाय को छोड़कर न सरक जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दौनो बुजुर्ग ने किसी बात पर थोड़ी नाराजगी जताई ध्यान गया तो मालूम पड़ा कि उनका बेटा काफी पढ़ा लिखा है मगर उसे नौकरी नहीं मिली मतलब साफ था कि हमारी कैटेगिरी का ही होगा। थोड़ी देर में सड़क पर कुछ युवा लड़के-लड़कियां दौड़ लगाते हुए सड़क से होकर निकले।  उन्हें देखकर चाय वाले ने ताल लगाई कि जनाब सारे बालक उसी के यहां परांठा खाने आते हैं सब एमबीए और इंजीनियरिंग के विद्यार्थी  हैं। उन खिन्न बुजुर्ग से रहा न गया और बोले कि अब एमबीए कर लो या दौड़ लगाओ नौकरी धरी कहां हैं। चाय खत्म हो चुकी थी और हम चारों  वहां से वापस अपने कमरे पर पहुंचे याद आया कि आज दोपहर में एक इंटरव्यू के लिए जाना है। हम तैयार होकर जैसे ही बाहर पहुंचे तो सुबह बुजुर्ग व्यक्ति की कही बात याद आई कि नौकरी धरी कहां है.....?




शनिवार, 2 जून 2012

वो देती है गम हरदम ये जीन नहीं देती है..

 इक दर्दे-मोहब्बत है, इक बेरहम है ये दुनिया
वो देती है गम हरदम, ये जीने नहीं देती है

 इक राहे-फकीरी है, इक शोहरत-ए-अमीरी है
 इक सोने को तरसती है, इक सोने नहीं देती है

 इक हुस्न से नजदीकी, इक मां के आंचल की छांव
 वो जी भर के रूलाती है, ये रोने नहीं देती है

इक गैर से याराना और यारी में भी जख्म मिलें
इक करती है मरहम तो, इक सीने नही देती है

 ना पूछ मेरी सरहद, पी जाऊं समंदर को
 बस याद मगर उसकी मुझको पीने नहीं देती है।







यदि हम भगवान हाते तो..









कुदरत ने हर प्राणी को बड़े करीने से बख्शा है उसी के अनुरूप उसकी क्षमताएं भी निर्धारित की हैं.क्या आपने कभी सोचा है कि ईश्वर ने जिस प्राणी को जो भी दिया है या जैसी भी शक्ल दी है वह एकदम सटीक है. भगवान ने इंसान को जैसा बनाया है या फिर जैसी भी क्षमताएं दी हैं वह एकदम उचित है. चलिए इमैजिन कीजिए कि तोते बिल्लियों की शक्ल लेकर उड़ते,  खरगोश के सिर पर मुर्गे जैसी कलगी होती चिड़ियों का मुहं घोड़े जैसा होता या उल्लू लोमड़ी का मुहं लिए उड़ता। शेर का मुहं चिंपाजी जैसा होता या फिर  भेड़ की गर्दन आस्ट्रिच जैसी होती तो आप इन जानवरों को कैसे पहचानते और इन्हें क्या नाम देते। आप शायद कल्पना के संसार में खो गए  लेकिन जनाब हम इन कल्पानाओं को हकीकत का जामा पहना चुके हैं. जरा देखिए इन तस्वीरों को और कुदरत की अनमोल कारीगारी पर नाज करिए । कहीं भगवान ने हमारी गर्दन भी शुतुरमुर्ग जैसी ही बना डाली होती तो...............................

मंगलवार, 29 मई 2012

भ्रष्टाचार खत्म हो गया तो........ ?


जब-जब भ्रष्टाचार से मुकाबला करने की बात आती है तो हम एक ऐसे समाज की कल्पना करने लगते हैं जहां भ्रष्टाचार नाम का शब्द  ही न हो, लेकिन जब हम खुद  भ्रष्टाचार का सहारा लेते हैं तो इससे मुंह भी नहीं मोड़ पाते हैं। फर्क केवल इतना है कि जब हम स्वयं किसी काम को निपटाने के लिए अतिरिक्त साधनों का सहारा लेते हैं तो भ्रष्टाचार सुविधाओं को बटोरने का माध्यम बन जाता है और यदि कोई अन्य व्यक्ति उन सुविधाओं को आप से ज्यादा रकम खर्च करके हासिल कर लेता है और आप उस सुविधा से वंचित रह जाते हैं तो, उसी पल आपके लिए यह भ्रष्टाचार के रूप में समाज की सबसे बड़ी समस्या बन जाता है। दरअसल भ्रष्टाचार का इतिहास बहुत ही पुराना है आप जिस भी विभाग में जाइए आपका काम तब तक नहीं बनेगा, जब तक कि आप पैसे खर्च नहीं करते हैं । आपको थाने में मानहानि की रिपोर्ट लिखानी हो, तो आपकी रिपोर्ट तब तक नहीं लिखी जाएगी, जब तक कि आप चाय पानी के लिए नहीं पूछते। बढिया ....  एक तो इज्जत गवांओं और ऊपर से रिपोर्ट लिखाने के लिए भी पैसे भरो। आपका फोन खराब है आप लाईनमैन को खुश करिए तभी आपका फोन सही होगा, अगर आपने लाईनमैन से यह कहा कि फोन सही करना उसकी ड्यूटी है तो, वह बहाने बना कर आपके फोन को और भी खराब बना देगा। आपको सरकारी अस्पताल में दिखाना हो, तो बावजूद सारी सुविधा के आपको दवाई नहीं मिलेगी और डॉक्टर तो आपको ऐसे घूरेंगें, कि जैसे आपने उनसे कुछ उधार लेकर दिया ही न हो। राशनकार्ड बनवाने,राशन लेने व घर की बिजली पानी की सारी सरकारी व्यवस्था के लिए भी या तो आप किसी उच्च अधिकारी से फोन कराईए या फिर रिश्वत दीजिए, क्योंकि ऊपर से लेकर नीचे तक सभी सरकारी विभागों के अधिकारी रिश्वतखोरी के अलावा कोई दूसरा काम कर नहीं सकते हैं।
ऐसी निराशाजनक स्थिति में भ्रष्टाचार के खिलाफ अवाज उठाना भी अपने जी का जंजाल बनाना है,जनता को धोखे में रखना है हाल ही के अन्ना समर्थन पर गौर कीजिए एक तरफ तो ईमानदारी से जीने के बड़-बड़े भाषण दिये जा रहे ह और दूसरी तरफ आपस में ही पॉकेटमारी से भी बाज नहीं आ रहे तो, भला किससे उम्मीद की जाए ईमानदारी के साथ शान से जीने की जनता से? अरे वह तो उन बंदरों की भूमिका अदा कर रही  हैं जो कि एक टोपी बेचने वाले की टापियां पहन-पहनकर पेड़ों पर जाकर बैठ गये और जब टोपी बेचने वाले ने अपनी टोपी उतारकर रख दी  तो सभी बंदरों ने भी अपनी-अपनी टोपियां उतारकर फेंक दी सो वही हाल यहां भी दिखाई पड़ रहा है, क्योंकि थोड़े दिनों की हाय-तौबा से तो भ्रष्टाचार देश से खत्म होने नहीं वाला है,अन्ना हजारे भी  उसी टोपी बेचने वाले का रोल अदा कर रहें हैं
अब आखिर भ्रष्टाचार के बिना हमारा काम भी तो नहीं चलता और अगर देखें तो वे राजनेता भला भ्रष्टाचार का खात्मा क्यों होने देंगें, जो इसी के दम पर अपनी अलकापुरी की नींव मजबूत कर रहें हैं। और वे सरकारी बाबू भला भ्रष्टाचार रूपी पेड़ को काटना क्यों पसंद करेंगें जिसके बूते वे अपनी तनख्वाह का दस गुना कमा रहे हैं,और आप व हम क्यों चाहेंगें कि भ्रष्टाचार देश से खत्म हो । चलिए कल्पना करते हैं कि यदि भ्रष्टाचार देश से खत्म हो जाए तो हमारी क्या स्थिति होगी जो इसे कोसते हैं लेकिन मौका मिलते ही इसका लाभ लेने से भी नहीं चूकते हैं । आप ट्रेन में सफर करते होंगें? कई बार ऐसा भी हुआ होगा कि बर्थ कन्फर्म नहीं हुई होगी, फिर भी निश्चिंत होकर बैठ जाते होंगें क्योंकि पता है कि टिकट चेकर कुछ पैसे लेकर बर्थ दे देगा, यदि सारे टिकट चेकर ईमानदार हो गए तो? कई लोगों के पास गैस कनेक्शन नहीं होगा और गैस ब्लैक में लेते होंगें यदि गैस डीलर गैस ब्लैक में देना बंद कर दे तो? आप दफ्तर में बीमारी के जाली सर्टिफिकेट दिखाकर छुटटी लेते होंगें यदि सारे डॉक्टर जाली प्रमाण-पत्र बनाना बंद कर दें तो? अब आपके पास गाड़ी तो होगी ही, और इसे चलाते हुए कभी ट्रेफिक रूल्स नहीं तोड़े क्या? कभी बच गए होंगें तो क भी फंस जाने पर कुछ ले-देकर छूट गए होंगें। सोचो कि वह ट्रेफिक पुलिस वाला आपका चालान करने पर आमदा हो गया होता तो? ऐसे और भी न जाने कितने मौके होंगें जब आपने भ्रष्टाचार का सहारा लेते होंगें और जाने-अनजाने यह सोचकर खुश हो जाते होंगें कि चलो कुछ रकम ही तो खर्च करनी पड़ी काम तो हो गया, वहीं दूसरे पहलु की तरफ गौर करें तो नतीजा यही निकलता है कि आज जिसकी लाठी उसकी भैंस का प्रचलन है यानी जिसकी ताकत उसकी सुविधाएं । अब जो पैसे वाला है वह रिश्वत देकर अपनी सीट कन्फर्म करा ली, दादागिरी करते हैं तो आंखे दिखाकर काम करा लिया,यदि राजनीति करते तो कल्याण ही कल्याण है,फिर ये सभी लोग जो येन -केन-प्रकारेण सारी सुविधाएं समेट लेना चाहते हैं वे भला भ्रष्टाचार का खात्मा क्यों होने देंगें,और हम आखिर हमें भी तो इसके साथ सहजता से जीने की आदत जो पड़ गई है।  

बुधवार, 23 मई 2012

हालात से यूं लड़ते चले गए.....

कभी दर्द दबाया कभी अश्क उमड़ते चले गए
कई-कई गुबार बारहा दिल में घुमड़ते चले गए

हुस्न-ओ-अदा-ओ-इज्जत पे कुबार्नियों का पाठ
इस ख़ैरात-ए-विरासत में पांव गड़ते चले गए

कोई नयी बात नहीं, है ये फितरत लोगों की पुरानी
वो इंसानियत के नाम पे जज्बात उधड़ते चले गए

थी बात अक्ल की उनके लिए, लाजिम थी सियासत
हम दिल से निकली हर बात पे लड़ते चले गए

सुबह-ओ-शाम का रखा जाए किस तरह हिसाब
दिन कम पड़ा तो रात पे भी झगड़ते चले गए

कभी कलम मेहरबान थी, कभी काबिल जुबान थी
हम उम्र भर हालात से बस यूं लड़ते चले गए

मंगलवार, 22 मई 2012

क्यों वो बचपन रूठ गया......

हाथ मेरे छोटी-सी डलिया
होतीं जिसमें फूल की कलियां
जाती थी मैं जब बन-ठन कर
होली-दिवाली गांव में घर-घर
जो तब था अब छूट गया
वक्त का दामन छूट गया
आज कहानी किसे सुनाऊं
क्यों वो बचपन रूठ गया,

गर्मी के मौसम में पेड़ों पर
चिड़िया का आशियां बनाना
चतुर गिलहरी पर छुप-छुप कर
पिचकारी से रंग गिराना
वही खिलौना कैसे जोडूं
कांच का था जो टूट गया
आज कहानी किसे सुनाऊं
क्यों वो बचपन रूठ गया,

सुरे-बेसुरे नगमे गाना
रात को दादा संग बतियाना
मैं तो बस आजाद उड़ूंगी
आसमान की सैर करूंगी
कहां वो बातें कही-अनकही
कौन वो सपने लूट गया
आज कहानी किसे सुनाऊं
क्यों वो बचपन रूठ गया।

तस्वीरें कुछ कहती हैं...


 एक तो गर्मी ये एसी भी अभी खराब होना था।

 अगर तूने रास्ते में धोखा दे दिया तो....।

 यहां धूप तो है मगर सुकून ज्यादा है.......... ।

 इसे कहते हैं मोटर साईकिल...........

 क्रिएटिव माइंड आपने सोचा कभी ऐसा....

....अब नेटवर्क आ गए अब  आवाज आ रही है......

. आज स्कूल का रिक्शा छूट गया, तू ही छोड़ आ।



अगली बार बीवी से झगड़ा नही करेंगे.....प्रोमिस........। 

अकेले सिर के लिए तीन चोटियां दो चार होते तो ..............

  परंमआनंद यहीं है यहीं है यहीं है.........।



  देश ओ दुनिया में क्या चल रहा है।

पापा को ज्यादा काम करना पड़ता है थोड़ी मदद ही कर दूं। 

                                लगता है एमएफ हुसैन ने चित्रकारी इन्ही महाशय से सीखी होगी............।

                               जमाना  बहुत बदल गया है इब मैं भी तो बदलूं अपणे आप णे...।
जी हां दिस काल्ड हायर स्टडीज...........

... इनसे सीखिए हैडफोन का इस्तेमाल करना

चप्पल चोर भी तो कम नहीं हैं देश में। 

जिंदगी का वजन इनसे कहीं भारी है।

   कौन कहता है कि सूरज इतना बड़ा है।

साधू बनना कोई आसान नहीं है।

हवा हवाई...................

तुझे कच्चा चबा जाऊंगा।

चलो एक ही बार में सारा सामान आ गया.......Ü